बुधवार, 9 अगस्त 2017

हृदयहीनता की पराकाष्ठा

आशा साहनी।
वही अभागी मां, मुम्बई के लोखंडवाला से कल जिसका कंकाल बरामद हुआ है।
अमेरिका में रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेटे की उससे अंतिम बार फोन पर बात अप्रैल 2016 में हुई थी। अकेले रह कर टूट चुकी बूढ़ी मां फोन पर रोई और बेटे से कहा कि अब अकेले रहा नहीं जाता। कहीं कोई वृद्धाश्रम तलाश करुँगी और वहीं रहूँगी। नाराज थी, गुस्से में थी तो कह दिया होगा कि आईंदा मुझे फोन मत करना और 'आज्ञाकारी' बेटे ने सचमुच सवा साल तक खबर ही न ली! बेटे को सवा साल से मालूम ही नहीं कि उसे जन्म देने वाली माँ किस हाल में है, जिंदा भी है कि मर गई।
हृदय हीनता की पराकाष्ठा! इसी बेटे के जन्म पर उस माँ ने उत्सव मनाया होगा।
बेटे ने कर्त्तव्य निर्वहन के नाम पर पैसे जरूर भेजे थे, कंकाल के सिरहाने 50 हजार रुपये पड़े मिले हैं। लेकिन माँ दौलत कब चाहती है। उसकी दौलत तो बेटा हुआ करता है।
ये माँ तो इतनी अभागी रही कि उसका बेटा दौलत को ही माँ मान बैठा।
और, सोसायटी के लोग ? पड़ोसी ?
निष्ठुर! निर्मम! तटस्थ ! बेटे को एक बार ई मेल किया था क्योंकि सोसायटी के रख रखाव के खर्चे के पैसे बुढ़िया ने 6-7 महीनों से भरे नहीं थे। कंकाल बिचारा भरता भी तो कैसे ? पैसों की चिंता तो हुई, लेकिन ये चिंता नहीं हुई कि दिन महीनों से घर का दरवाजा नहीं खुला है, कहीं कुछ गलत तो नहीं हुआ होगा !
लाश को कंकाल बनने में कम से कम 4 या 5 महीने लगते हैं। मतलब वृद्धा की मौत इससे पहले ही हुई है। खिड़की खुली थी, अपार्टमेंट में अच्छी हवा आ रही थी, इसलिए दुर्गंध फैली नहीं और जब तक हमारे नाक को कोई परेशानी न हो, तब तक हम क्यों परवाह करने लगे।
आलीशान फ्लैट के आरामदायक बेड पर पूरे कपड़े पहने पड़ा वो कंकाल या हड्डियों का ढांचा डरावना नहीं है। डरावना है- हम लोगों का इस तरह हृदय हीन - संवेदन हीन हो जाना।
हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी ?
महानगरीय सभ्यता का प्रभाव नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का क्षय न करे और आपको आशा साहनी की मानिंद न मरना पड़े, इसके लिए अपनी अगली पीढ़ी सम्भाल लीजिए।
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कल समाजशास्त्र की कोई किताब पढ़ रहा था। नगरीकरण के इतिहास में नगरों के उद् विकास का क्रम ना जाने क्यों कुछ संकेत देता सा जान पड़ता है।
कस्बे (इकमेनोपॉलिस) से नगर (पॉलिस), नगर (पॉलिस) से महानगर (मेट्रोपॉलिस), महानगर (मेट्रोपॉलिस) से अति महा नगर (मेगालोपॉलिस)।
यहाँ तक हम पहुंच चुके हैं।
समाज एवं शासन में नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का क्षय होते रहने से अति महानगर (मेगालोपॉलिस) बनता है- उत्पीड़क नगर (टायरनोपॉलिस)।
और इससे आगे ?
अंत !
नेक्रोपॉलिस !
मुर्दों का नगर!


मंगलवार, 8 अगस्त 2017

रक्षाबंधन विशेष - मायरो

बीरा बणजे तू जायल रो जाट,
बणजे खिंयाला रो चौधरी।
कथा लगभग छह सात सौ साल पहले की यानि कि सल्तनत काल की है और यूं है कि नागौर में दो चौधरी हुआ करते थे। नाम था गोपाल जी और धर्मो जी। गोपाल जी जायल गांव के बासट गोत के जाट और धर्मो जी खिंयाला के बिडियासर । दोनों चौधरी उस समय के पटवारी के पद पर थे। दिल्ली के सुल्तानों के लिए लगान संग्रहण करने का कार्य किया करते थे और ये काम वो दोनों कई सालों से किया करते थे। क्योंकि सुल्तान बदल जाया करते हैं, पटवारी नहीं बदला करते।
दोनों चौधरी साल में एक बार किसानों से निर्धारित रकम वसूला करते, जो भी सुल्तान गद्दी पर होता, उस तक पहुंचा दिया करते और अपनी तनख्वाह ले लिया करते।
इस बार हुआ यूं कि सुल्तान ने लगान बढ़ा दिया। कारण क्या रहा, मुझे नहीं मालूम। कोई नई लड़ाई छेड़ बैठा होगा, कोई नई खुराफात सूझी होगी या कोई नई शादी की मन में आ गई होगी।
दिल्ली की जायज नाजायज मांगे दूर कहीं खेतों में खप रहा किसान हमेशा से ही आंखे मींच पूरी करता रहा है।
खैर, कारण जो भी रहा हो, कहानी को इस बात से मतलब है कि चौधरियों को दुगुने पैसे ले कर जल्दी से जल्दी वहां पहुंचने के लिए पाबन्द किया गया था।
तो नागौरी चौधरी भागे, दौड़े, माया इकट्ठी की और ऊंटों पर रकम बांध कर सुल्तान को सौंप देने दिल्ली के लिए तैयार हुए।
सूर्योदय से पहले,जायल में बने गोपाल जी के घर से दोनों साथी ऊंटों पर सवार हो कर निकले और शाम ढलने के बाद 7-8 बजे तक हरमाड़ा नाम के एक गांव तक पहुंचे। जायल से पचास साठ कोस दूर। जयपुर से थोड़ा सा पहले।
चूंकि दिन भर चलते चलते चौपाए और दोपाए दोनों थक चुके थे, इसलिए हरमाड़ा गांव की कांकड़ में कुंए के पास चौधरियों ने डेरा जमाया, ऊंटों को चारा पानी किया और खुद सन्ध्या पूजा कर भोजन करने बैठे।
उसी गांव की गुर्जर जाति की एक सामान्य सी गृहिणी, लिछमा, उस समय अपनी पुत्री के परिणय उत्सव के प्रबंध में लगी थी। लेकिन विवाह के उत्साह से बिल्कुल परे। आकुल, व्याकुल, दुविधाग्रस्त और कारण ये था कि उसके पीहर (मायके) में कोई था नहीं जो उसकी पुत्री के विवाह में भात भरने के लिए आ सके।
भात या मायरे की प्रथा में विवाह के सुअवसर पर मातुल पक्ष के लोग कुछ उपहार ले कर प्रस्तुत होते हैं। ये उपहार सामान्यतः वस्त्र,आभूषण या नकदी के रूप में होते हैं। सामर्थ्य श्रद्धा अनुसार।
लेकिन उपहार और सहायता के नाम पर चली ये परम्परा प्रतिष्ठा का प्रश्न बनते हुए मध्यकाल में महिलाओं के लिए गले की फांस बन गयी थी।
जब तक मायके से मायरा आ न जाए (अच्छे भले उपहारों के साथ), तब तक ना तो नारी चिंता मुक्त हो पाती थी और ना ही कुल कुटुम्ब उसे चैन से सांस लेने ही देता था। भात में कितने पैसे आए, कौन कौन से आभूषण आए, किस भाँति के वस्त्र आए इत्यादि प्रश्नों के उत्तर आने वाले कई दिन-महीनों-सालों तक ससुराल में नारी की प्रतिष्ठा और महत्त्व को निर्धारित करते थे। भात कम आने का अर्थ ही जहाँ जीवन भर सास-ननद, देवरानी-जेठानी आदि के ताने हुआ करता हो, वहाँ भात नहीं आने पर क्या हाल हो सकता है, कल्पना सहज ही की जा सकती है।
अब, अगले दिन विवाह का कार्यक्रम निश्चित था। घर भर में उत्सव का उत्साह और उमंग। जेठानी और देवरानी की पुत्रियों का भी विवाह था। उनका भी भात कल ही आना था, वे दोनों अपने अपने पिता-भाई और भात के स्वागत का प्रबंध कर रही थीं।
ऐसे में लिछमा स्वयं को दुर्भाग्यशाली न समझे तो क्या करे, पिता संसार छोड़ कर चल बसे थे, सगा भाई कोई था नहीं। मां के जाए बीर बिना कुण भात भरण ने आवे! आंसू आंखों की कोर में तैर रहे थे, छलके नहीं, क्योंकि अभी तक इस प्रसंग पर चर्चा हुई नहीं थी। लिछमा को लगा- मेरे मायके की स्थिति सर्वज्ञात है, हो सकता है इसी से मुझे मायरे से मुक्ति दे दी गई हो।
लेकिन ऐसा थोड़े ही हुआ करता है। पंजाब में कहावत है- सांप में एक 'स', सास में दो 'स'। सास ये मौका ऐसे ही थोड़े छोड़ देने वाली थी। सास समुदाय की प्राचीन एवं प्रचलित परम्परा का पूर्ण रूपेण निर्वहन हुआ। खुल कर तिक्त वचन सुनाए गए।
भात बिना कोई विवाह हुआ है कभी जो तेरी बेटी का हो जाएगा, फूटे भाग हमारे जो तेरे जैसी बहु मिली, मर क्यों नहीं जाती कहीं जाकर!
अपमान के नमक से अंतर के घाव चिरमिरा उठे। लिछमा रोने लगी। मन में विचार आया-तिरस्कार सह कर जीने से तो अच्छा प्राण ही दे दिए जाएं। कौनसा सार बचा है जीवन में।
पनघट से पानी लाने का बहाना बनाया, घड़ा उठाया और रोते रोते चल पड़ी।
लिछमा पनघट पर बैठ के खुल के रोई, सोचा- मरना तो है ही, जी तो हल्का करूँ।
राम जाने विधाता ने कैसे भाग लिखे हैं, जो कोई मेरा भी भाई होता तो आज मरने की नौबत थोड़े ही आती।
भाग्य को भी लिछमा की तरह कोसा जाना सहन नहीं हुआ और उसने भी बदल जाने की ठान ली।
और भाग्यवश, दैव योग से ही, लिछमा का रुदन चौधरियों के कानों में पड़ा।
चौधरी भोजनादि से निवृत्त हो कर सोने की तैयारी कर रहे थे। रुदन सुन चौंके।  रात्रि का दूसरा प्रहर शुरू होने को है, ऐसे में पनघट पर स्त्री कण्ठ से रुदन की ध्वनि, यह कौन दुखियारी है।
दोनों में से एक उठा, लिछमा तक पहुंचा और बोला- री पणिहारी! रोती क्यों है, कौन विपत्ति आन पड़ी। मुझे बता, शायद मैं कुछ सहायता कर सकूँ।
लिछमा ने सोचा- इसे सुना कर ही क्यों न मरूँ, मरना तो है ही, जी तो हल्का हो।
लिछमा ने चौधरी को सब कुछ कह सुनाया।
चौधरी साहब व्यथा सुन व्याकुल हो गए, बोले- पणिहारी, कौन कहता है तेरा कोई भाई नहीं है,मुझे राखी बांध,मैं तेरा भाई हूँ।
लिछमा हिचकिचाई, चौधरी फिर बोला- लिछमा, चीर फाड़ के बांध कलाई पर, मैं तेरा धर्म का भाई हूँ। अब से तेरा सम्मान मेरा सम्मान। तेरी लाज मेरी लाज। तेरी व्यथा- मेरी व्यथा। भात की चिंता मत कर। भात मैं भरूँगा।
चौधरी की जबान थी, लिछमा आश्वस्त हो गई।
लिछमा के ओढ़नी के टुकड़े ने चौधरी की कलाई पर बन्ध कर भाई बहन के रिश्ते की नींव पड़ने की साख भरी।
गूजरी दुःख की घड़ी में भाई का सा स्नेह पा बड़ी प्रसन्न हुई और घड़ा उठा घर की ओर चली।
सास-ननद, जेठानी-देवरानी के पक्ष से विष बुझे वचन शरों का वर्षण जारी रहा। लेकिन लिछमा तो मन ही मन मुदित थी, प्रमुदित थी सो सब झेलती रही।
उधर, चौधरी ने दूसरे चौधरी को सारा वृत्तांत सुनाया और कहा- वचन दे आया हूँ, सुबह भात भरना है।
दूसरा चौधरी जबान की कीमत समझता था, भात भरने का कह दिया, मतलब भात तो भरना ही है।
लेकिन, पैसे कहाँ से आएं ? ऊंटों पर जो रकम लदी है, वो तो मालगुजारी के पैसे हैं। सुल्तान की अमानत। हिंदुस्तान की सरजमीं पर एकछत्र राज करने वाले बादशाह की अमानत और इस अमानत में खयानत करना यानि अपनी मौत खुद आमन्त्रित करना। रकम भी कोई छोटी मोटी नहीं थी, पूरी 22000 अशर्फियाँ। सैंकड़ो किसानों से वसूला गया कर। राजा ज़िंदा तो नहीं छोड़ेगा। ये तो तय है। क्या किया जाए।
लेकिन, जबान दे, फिर नट जाएं, इससे अच्छा तो यही कि कट जाएं। प्राण जाय पर वचन न जाई।
भात तो भरेंगे, बादशाह जो करेगा, देखा जाएगा।
चौधरियों ने खूंटों से बंधे ऊंटों को खोला, सवार हुए और घण्टे भर में जा पहुंचे जयपुर।
कुछ पुरानी पहचान का वास्ता दिया, कुछ पैसों का जोर दिखाया,आधी रात में दो चार दुकानें खुलवाई और मायरे के लिए उपहार, वस्त्र और आभूषण खरीद भोर होते होते पुनः हरमाड़ा पहुंच गए।
सुबह, जब बात गांव भर में फैली कि लिछमा के धर्म भाई आए हैं और भात भी भरा जाएगा तो इसे मजाक समझ देवरानी जेठानी ने मुंह बनाया। कल तक तो कोई भाई न था। अब कौन कृष्ण भगवान भात भरने आ रहे हैं।
लेकिन कलाई पर बंधे चीर ने फिर एक अद्भुत मुहूर्त की साख भरी। भाई ने बहन को गले लगाया, भात भरा और सम्मान की प्रतीक नौरंगी चूनरी ओढ़ाई। लिछमा ने मंगल गीत गाये। पूरे कुल कुटुम्ब के बीच लिछमा नौरंगी चूनरी ओढ़े खड़ी थी। भाव विह्वल। एक सूत्र की शक्ति, एक धागे की ताकत संसार देख रहा था। अज्ञात कुल, नाम, ग्राम की नारी, जिसे कल तक देखा तक न था, उसके हाथों रक्षा सूत्र बन्ध जाने के बाद, उसके सम्मान की रक्षा की खातिर चौधरी बादशाह तक को चुनौती दे बैठे।
भात में पूरे कुल कुटुम्ब में छोटे बड़े सब लोगों के लिए तरह तरह के वस्त्राभूषण सहित अन्य उपहार दिए गए। चौधरियों ने बहन और भानजी को शीशफूल से लेकर झांझर तक के आभूषणों से लाद दिया।सास-ननद, देवरानी- जेठानी ने भी अपना हिस्सा पाया।
इस तरह नेह सूत्र- रक्षा सूत्र से बंधे भाईयों ने बहन के सम्मान की रक्षा की और भात में दोनों ऊँटों सहित सारी माया लुटा, हाथ जोड़, चौधरी दिल्ली को निकल पड़े।
दो चार दिन बाद दिल्ली पहुंचे, दरबार में हाजरी लगाई। मालगुजारी जमा करवाने के वक़्त बादशाह के सम्मुख हाथ जोड़ खड़े हो गए। पूरा वृत्तांत कह सुनाया। मौत का भय तो था ही नहीं, मरना तो निश्चित मान के गए थे। लेकिन- "हिम्मत कीमत होय, बिन हिम्मत कीमत नहीं।" "कर भला तो हो भला।" बादशाह घटना सुन कर और चौधरियों की हिम्मत देख कर प्रभावित हो गया। उसने घटना की सत्यता जांचने का हुक्म दिया और सत्यता प्रमाणित होते ही दोनों चौधरियों को पुरस्कृत भी किया।
दोनों चौधरी सुल्तान के यहां से 1000 बीघा जमीन पुरस्कार में प्राप्त कर खुशी खुशी घर लौटे और हजार बीघा जमीन के साथ ही कमा लाए- हजारों वर्षों के लिए नाम। राजस्थान में आज तक बहनें अपने भाईयों से उन चौधरियों की तरह बनने को कहा करती है। वचन के पक्के, निडर, हिम्मती और दरियादिल। आज भी रक्षा बंधन के और भात के गीतों में ये पंक्तियां गाई जाती हैं-
"बीरा बणजे तू जायल रो जाट,
बणजे खिंयाला रो चौधरी।"
- लक्ष्मण बिश्नोई लक्ष्य

रविवार, 27 नवंबर 2016

मानव धर्म

नहीं आवश्यक परिक्रमा देवालयों के स्वर्णिम विग्रह की।
नहीं आवश्यक भक्ति साधना किसी कुपित क्रोधी ग्रह की।
नहीं आवश्यक है कि तुम तीर्थ यात्रा करते घूमो।
नहीं आवश्यक है कि तुम मस्जिदों की चौखट चूमो।
किसी धर्म ग्रन्थ का पाठ भी नहीं आवश्यक है कभी।
गंगा यमुना का घाट भी नहीं आवश्यक है कभी।
मानव हित में महान पुण्य, परोपकार का कर्म है।
भूखे को रोटी देना ही सच्चा मानव धर्म है।
----> लक्ष्मण बिश्नोई "लक्ष्य"

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

सपनों को मरने मत देना

तेज आँधियों को दिये के,
प्राण कभी हरने मत देना।
सपनों को मरने मत देना।।

गगरी फूटी, नई बनाओ।
माला टूटी,फिर से सजाओ।
नन्हें कदम जब बढ़ना चाहें,
पकड़ अंगुली, हिम्मत बढ़ाओ।

चलना सीख रहे बच्चे को
गिरने से डरने मत देना।
सपनों को मरने मत देना।।

धूप नहीं,उजियारा देखो।
दुनिया से कुछ न्यारा देखो।
तूफानों से कांपे जगत जब,
पार कहीं किनारा देखो।

भँवरों से भी भिड़ जाने दो,
कश्ती खड़ी करने मत देना।
सपनों को मरने मत देना।।
----> लक्ष्मण बिश्नोई 'लक्ष्य'

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

मेरे जीवन की हिस्सेदार हर नारी को समर्पित

जगती में जब मेरा जीवन,
आहत अकुलाए आघातों में।
क्लांत कलेजा कूक पड़े जब,
दु:ख की चुभती बरसातों में।
जब मन के प्रकाशित कोनों में,
स्याह अंधेरा जम जाए।
जब प्रगति पथ पर जीवन रथ,
खा हिचकोले, थम जाये।
उमंग भरी इन आँखों में मेरी,
यह दृश्य जो फिरा कभी-
शिखरों पर बैठा मैं, गर्त में
अभी गिरा,हाय!गिरा अभी
तब तुम आना, प्रेरक बनकर,
उम्मीदों की सौगात लिए।
तब तुम आना, प्रथम किरण सी,
मनमोहक प्रभात लिए।
तुम दीपक बनकर, मुझको, जग में
तम से लड़ना सिखला देना।
कर सारथ्य जीवन रथ का,
राह नई तुम दिखला देना।
मेरे तुम पर विश्वासों को,
साबित करना तुम सत्य सदा।
सफल पुरुष की शक्ति नारी,
सत्य रहे यह तथ्य सदा।।
---> लक्ष्मण बिश्नोई लक्ष्य
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